जैसा की नाम से ही स्पष्ट है की पुत्रदा यानि पुत्र/संतान देने वाली। सनातन धर्म में एकादशी के व्रत का बहुत महत्व होता है। उसमें भी पुत्रदा एकादशी की अपनी अलग महत्ता है। साल में 2 पुत्रदा एकादशी आती है। पहली पौष माह में और दूसरी सावन के माह में। निस्तान दंपति इस एकादशी को व्रत रखकर भगवान विष्णु से संतान सुख की कामना करते हैं। ऐसा माना जाता है की अगर आप सच्चे मन और श्रद्धा से पुत्रदा एकादशी का व्रत करों तो श्री हरी आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं।
किसी भी व्रत को करने के अपने नियम और विधि होती है जैसे की व्रत की पूजा विधि क्या है ? भोजन क्या करना है और क्या नहीं करना है ? व्रत कथा क्या है ? आदि।
पौष पुत्रदा एकादशी के नियम भी बाकी एकादशी की नियम के समान ही हैं।
- इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।
- इस दिन चावल, नमक, मसूर की दाल नहीं खाना चाहिए।
- इस दिन दातुन / brush नहीं करना चाहिए।
- दशमी के दिन से आपको सात्विक भोजन करना शुरू कर देना चाहिए यानि भोजन ज्यादा तला भुना नहीं हो और भोजन में प्याज, लहसून और अदरक का प्रयोग न करें।
- माँस मदिरा से दूर रहें।
- एकादशी के दिन तन और मन से ना किसी का बुरा सोचे और ना करें। पूरे दिन श्री हरी का जाप करें। किसी को बूरे वचन, चुगली क्रोध आदि तामसिक गुणों से दूर रहें।
- चूंकि यह तीन दिवशीय व्रत होता है इसलिए दशमी से लेकर द्वादशी तक ब्रह्मचर्य का पालन करें।
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