(1) भारत सरकार ने 2017 में गेजेट में छापा कि - यदि कोई व्यक्ति 20 कर्मचारियों से अधिक की कम्पनी चला रहा है और यदि उसकी महिला कर्मचारी गर्भ धारण कर लेती है. तो कम्पनी का मालिक अमुक महिला को 6 महीने की छुट्टी देगा और इन 6 महीनो के दौरान उसे पूरा वेतन भी देगा !!
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इस क़ानून के 2 उद्देश्य थे :
- छोटी इकाइयों के प्रोडक्ट की लागत एवं उनके झमेले बढ़ाना
- देश की प्रोडक्टिव युवतियों के अवसरों को कम करना
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिको ने यह क़ानून छापने के लिए लॉबीइंग की थी। 50 से 500 स्टाफ की छोटी इकाइयां सीमित बजट में काम करती है, और यदि उन पर 1-2 एम्प्लोयी को मुफ्त में सेलेरी देना पड़ जाए तो उनकी लागत बढ़ जाती है। किन्तु बड़ी एवं विशालकाय कम्पनियां इस भार को आसानी से उठा सकती है।
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नतीजा :
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छोटी स्टार्ट अप इकाइयों ने ऐसी महिलाओं को किसी न किसी बहाने से नौकरी से निकालना शुरू किया जिनके बारे में सम्भावना थी कि वे गर्भ धारण कर सकती है। मैं किसी भी संस्था द्वारा किये गए सर्वे वगेरह में नहीं मानता हूँ, क्योंकि ज्यादातर सर्वे फर्जी होते है, और सर्वे में उन्ही नतीजो को दिखाया जाता है, जो नतीजा दिखाने के लिए सर्वे के स्पोंसर ने भुगतान किया है।
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किन्तु मेरी स्वयं की जानकारी में ऐसे 7-8 मामले है जिनमे मालिक ने महिला एम्प्लोयी को नौकरी से निकाल दिया था। और सर्वे वालो की माने तो 2 साल में लगभग 6-7 लाख महिलाएं इस क़ानून की चपेट में अपना जॉब गँवा चुकी है। और ऐसी कितनी ही महिलाएं है जिन्हें यह पता नहीं है कि उन्हें इस नए क़ानून वजह से रिजेक्ट किया जा रहा है !!
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कुछ स्टार्ट अप्स ने काबिल महिलाओं से कांट्रेक्ट साइन कराने शुरू किये कि वे अमुक अमुक अवधि तक गर्भ धारण नहीं करेगी। और इस तरह उन्हें स्थायी नौकरी की जगह कांट्रेक्ट पर काम करना पड़ा।
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उल्लेखनीय है कि अमेरिका में प्रसव कालीन अवकाश के एवज में नियोक्ता पर एक रूपये का भी अतिरिक्त भार नहीं डाला जाता है, और नियोक्ता उसे अन पेड लीव देता है। प्रसव के बाद महिला फिर से नौकरी पर आना शुरू कर सकती है। और इस वजह से न तो छोटी इकाइयों के मालिक महिलाओ को नौकरी देने से कतराते है, न ही महिलाओं को नौकरी गंवानी पड़ती है !!
आप इस उदाहरण को अपने ऊपर लागू करके देख सकते है कि, यदि आप एक 50 एम्प्लोयी की इकाई खोलते है, जिसमें 8 से 10 महिलाएं है और इनमें से सभी 22 वर्ष से 32 वर्ष के बीच की आयु की है, तो क्या आप इन्हें नौकरी पर रखने का जोखिम उठाएंगे ? मेरे विचार में आप यह जोखिम उठाने से बचेंगे।
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तो महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्या गलत हो रहा है ?
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इस क़ानून को महिला सशक्तिकरण का टैग लगाकर लागू किया गया, और महिला अधिकारों पर लिखने वाले पेड विशेषज्ञों और फुरसतियों ने इसके पक्ष में मुहीम चलायी !! इन महिला अधिकार कार्यकर्ताओ की तरफ से इस क़ानून के कारण नुकसान उठा रहे कारखाना मालिक और युवा महिलाएं चाहे तो भाड़ में जा सकते है !!
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इसके अलावा पेड मीडिया ने दंगल जैसी गलीज़ फिल्म को महिला सशक्तिकरण से जोड़ा और सरकार ने इस फिल्म का प्रमोशन किया !!
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मतलब सरकार की महिला सशक्तिकरण की नीति है कि महिलाओं को स्टार्ट अप्स, कारखानों, कम्पनियों में काम करने की स्किल जुटाने की जगह पर पहलवानी करनी चाहिए !! और महिला अधिकार कार्यकताओ ने इस फिल्म को प्रोत्साहित करने में भी कोई कसर नहीं रखी !! यह सामान्य समझ की बात है कि यदि 500 लड़कियां पहलवानी करेगी तो उनमे से सिर्फ 1–2 को ही रोजगार मिल सकता है, और शेष को कोई रोजगार नहीं मिलने वाला है। और ज्यादातर सम्भावना है कि स्टेराइड वगेरह लेने की वजह से उनका शरीर भी ख़राब हो जाए।
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समाधान ?
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मेरे प्रस्ताव इस तरह है :
- काम काजी महिला यदि आयकर दाता है तो प्रसव कालीन स्थिति में सरकार उसे वेतन के बराबर की राशि की आयकर में छूट देगी। इस छूट को उसके एवं उसके पति के आयकर में तब तक समायोजित किया जाएगा, जब तक उसके 6 महीने के वेतन के बराबर राशि समायोजित न हो जाए।
- नियोक्ता पर कोई भार नहीं होगा। महिला प्रसव के बाद जब फिर से ज्वाइन करती है तो उसके सेवा वरिष्ठता के लाभों में नियोक्ता कटौती नहीं कर सकेगा।
- यदि काम काजी महिला आयकर दाता नहीं है तो सरकार उसे 6 माह तक X रूपये माँहवार देगी।
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(2)
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2011 में सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने यह रूलिंग छापी कि - बलात्कार के मामले में पीड़ित लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा, और आरोपी को सजा देने के लिए पीड़ित लड़की के बयान को पर्याप्त सबूत माना जाएगा !!
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हाँ आपने सही पढ़ा है !! इसे फिर पढ़िए -
बलात्कार के मामले में पीड़ित लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा, और आरोपी को सजा देने के लिए पीड़ित लड़की के बयान को पर्याप्त सबूत माना जाएगा !!
Rape victim's testimony sufficient for conviction: SC
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यह पंक्ति बॉलीवुड के किसी स्क्रिप्ट रायटर की नहीं है, यह रूलिंग सुप्रीम कोर्ट के जजों ने दी थी।
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आपने नोटिस किया होगा कि पिछले कुछ वर्षो से अचानक यौन शोषण / बलात्कार के मामलों के दर्ज होने और इसके मीडिया में आने की संख्या में इजाफा हो गया है। इसकी असली वजह यह रूलिंग थी। इस रूलिंग ने महिलाओ / युवतियों को यह मौका दिया कि वे अपने बॉस, मैनेजर, वरिष्ठ सहकर्मियों, मालिक, नियोक्ता या किसी बड़े आदमी को अदालत में घसीट सके।
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कुछ अवसरवादी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल पुरुष साथियों को ब्लेकमेल करने में किया और पेड मीडिया द्वारा इन्हें जमकर कवरेज दिया जाने लगा। नतीजा, नियोक्ताओ को लगने लगा कि महिलाओं के साथ एक निश्चित दूरी बनाकर रखना जरुरी है, और उन्होंने भीतरी दायरे में महिलाओं को नियुक्तियां देना बंद कर दिया !!
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नियोक्ताओ ने उन महिलाओं को भी निकालना शुरू किया जहाँ कई पुरुषो के बीच काफी कम महिलाएं काम कर रही है। उन्हें लगा कि यदि मेरा कोई पुरुष कर्मचारी महिला के साथ कोई गड़बड़ कर देता है तो मामला मीडिया में रिपोर्ट हो गया तो मैं झमेले में आ जाऊँगा।
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बाद में नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को भी फंसाने के लिए इस क़ानून का इस्तेमाल करना शुरू किया, और हिन्दू धर्म के सभी संतो को महिला अपराधो के आरोप में जेल में डालने के लिए इसी रूलिंग का इस्तेमाल किया गया।
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अब भारत में जिस तरह का पुलिस सिस्टम एवं अदालतें है उस हिसाब से आप साफ़ तौर पर देख सकते है कि इस रूलिंग का इस्तेमाल करके कोई भी अपेक्षाकृत छोटा आदमी किसी बड़े एवं बहुत ताकतवर आदमी को फंसा नहीं पायेगा, किन्तु बहुत बड़ा आदमी किसी लड़की का इस्तेमाल करके अपने से कमतर प्रतिद्वंदी को आसानी से गिरा देगा।
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उदाहरण के लिए एक मंत्री किसी भी कारखाना मालिक या विधायक आदि को गिरा सकता है, किन्तु ये लोग मंत्री को नहीं फंसा पायेंगे। और सामान्य मामलो में हर बार वो आदमी फंस जायेगा जिसके पास ज्यादा पैसा है। मलतब वह सेटलमेंट करके मुकदमे से तो बच जाएगा किन्तु बदले में पुलिस, नेता एवं जज उससे अच्छा ख़ासा पैसा खींच लेंगे। भ्रष्ट जजों और भ्रष्ट नेताओं ने इस रूलिंग का इस्तेमाल करके अपने काफी प्रतिद्वंदियों को यौन शोषण के मामलों में फंसाया और उनसे पैसा खींचा !!
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नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के क्लोज़ सर्किल में एपोइंट होने के अवसर सिकुड़ गए। पिछले 3 साल में मेरे खुद के सामने ऐसे दर्जन भर वाकये गुजर चुके है जब महिलाओं को इस वजह से नौकरियां गंवानी पड़ी है। और विडम्बना यह है कि उन महिलाओं / लडकियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इस रूलिंग की वजह से वे नौकरियां गँवा रही है !! ऐसे सैंकड़ो वाकिये है जब महिलाओं ने समृद्ध पुरुषो / नियोक्ताओ को इस रूलिंग का सहार लेकर धमकाया और उनसे पैसा वसूल किया। और इन 0.1% मामलों को पेड मीडिया द्वारा इस तरह कवरेज दिया गया कि शरीफ लोग महिलाओं को नियुक्तियां देने से कतराने लगे !!
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तो महिला सशक्तिकरण के नाम पर क्या गलत हो रहा है ?
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भ्रष्ट जजों की इस रूलिंग को महिला अधिकार कार्यकर्ताओ और पेड विशेषज्ञों ने महिला सुरक्षा से जोड़ा और इसे महिला सशक्तिकरण की तरह प्रचारित किया !!
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समाधान ?
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यदि महिलाओ की सुरक्षा का लिए प्रावधान नहीं बनाए गए तो पुरुषो द्वारा उनके शोषण के मामलों में वृद्धि हो सकती है, और यदि महिलाओं को गलत रूप से अतिरिक्त फायदे दिए गए तो कुछ 0.1% महिलाएं इसका बेजा फायदा उठाएगी और शेष महिलाएं आइसोलेट होने लगेगी। इस स्थिति से निपटने के लिए हमें संतुलन बनाने की जरूरत है। और जूरी कोर्ट के अलावा मैं इस संतुलन का कोई मार्ग नहीं देखता !!
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मेरा प्रस्ताव है कि —
- महिलाओं से सम्बंधित सभी प्रकार के अपराधो की सुनवाई करके का अधिकार महिलाओं की जूरी को दिया जाए। इस जूरी में सिर्फ महिलाएं होंगी।
- महिलाओं का चयन मतदाता सूची से किया जायगा और उनका आयु वर्ग 25 वर्ष से 55 वर्ष होगा।
- जूरी मंडल में 12 महिलाएं होंगी, और फैसला देने के बाद जूरी भंग हो जायेगी।
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(3)
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दहेज़ वाला क़ानून : दहेज़ वाले क़ानून की वजह से भी काफी गदर मची हुयी है। इस क़ानून को खतरनाक बनाने के लिए इसमें यह प्रावधान जोड़ा गया था कि, लड़की के बयान में लड़की जितने भी सदस्यों के नाम लिखवा देती है, पुलिस को एक बार उन सभी को अरेस्ट करना पड़ता है, और बाद में जमानत शेषन कोर्ट एवं कुछ मामलो में हाई कोर्ट से होती है।
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तो लड़की परिवार के सभी सदस्यों के नाम लिखवा देती थी, और पुलिस परिवार से हफ्ता वसूलने पहुँच जाती है। आज की तारीख में दहेज का क़ानून सबसे ज्यादा कमाई का क़ानून बन गया है, और महानगरो में दहेज़ के मामलो से एक Dysp सर्किल साल के 2 से 5 करोड़ बना लेते है। बाद में यह पैसा जजों समेत उच्च अधिकारियों तक बंट जाता है। यह क़ानून काफी पुराना है (शायद 1985 के आस पास का ) किन्तु बाद में वे इसे धीरे धीरे कठोर बनाते गए।
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इस क़ानून को भी महिला सशक्तिकरण से जोड़ा जाता है !!
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इस क़ानून की वजह से महिलाओ को फर्स्ट राउंड में फायदा होता है किन्तु सेकेण्ड राउंड में बेहद नुकसान होता है। एक बार मुकदमा दर्ज होने के बाद मामला अदालत में जाकर फंस जाता है, और सालों तक महिला का भविष्य अधर में लटका रहता है।
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लाखों परिवारों को लूटने के बाद जब यह बात नागरिको की कॉमन नोलेज में आ गयी कि यह क़ानून लोगो की जिंदगियां बर्बाद कर रहा है तो सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने इस समस्या का समाधान करने का ड्रामा किया। उन्होंने इस आशय की रूलिंग छापी जिसमे — जमानत देने का जिम्मा स्थानीय जज को दे दिया और गिरफ्तारी होगी या नहीं यह फैसला करने के लिए प्रत्येक जिले में एक 5 सदस्यीय कमेटी बनाने की अनुशंषा की।
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इस कमेटी में एक रिटायर्ड जज भी होता है और जज द्वारा नियुक्त कुछ उनके आदमी होते है। इस रूलिंग के आने के बाद अभी दहेज़ के छोटे मोटे मामलो में तत्काल गिरफ़्तारी एवं जमानत को लेकर राहत मिली है, किन्तु बड़े मामलों में कमेटी के लोग गिरफ़्तारी ना होने देने के एवज में पैसा खींच रहे है।
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छोटे मोटे मामलो में भी राहत थोड़े समय के लिए है, और किसी भी समय वे फिर गदर मचाना शुरू कर देंगे। क्योंकि उन्होंने इसका स्विच अपने हाथ में रखा हुआ है।
यह क़ानून युवतियों / युवको / तलाक शुदाओ / अदालत में फंसे दम्पत्तियों को लिव इन रिलेशन शिप की और धकेल रहा था। किन्तु लिव इन का क़ानून न होने की वजह से समस्या हो रही थी।
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तो अभी पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्ट जजों ने बिना शादी के लिव-इन में रहने को कानूनी बनाने के लिए रूलिंग छापी जो कहती है कि -
- Two adults have the right to live together even if they have not attained marriageable age.
- A domestic cohabitation between an adult unmarried male and an adult unmarried female.
- A domestic cohabitation between a married man and an adult unmarried woman (entered mutually).
- A domestic cohabitation between an adult unmarried man and a married woman (entered mutually).
- Partners living together for a long time may have kids together.
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- दो वयस्कों को एक साथ रहने का अधिकार है, भले ही उन्होंने विवाह योग्य आयु प्राप्त नहीं की हो।
- एक वयस्क अविवाहित पुरुष और एक वयस्क अविवाहित महिला के बीच एक घरेलू सहवास वैध होगा।
- एक विवाहित पुरुष और एक वयस्क अविवाहित महिला ( आपसी सहमती के साथ ) के बीच एक घरेलू सहवास वैध है।
- एक वयस्क अविवाहित पुरुष और एक विवाहित महिला के बीच एक घरेलू सहवास जायज होगा ( आपसी सहमती के साथ )।
- लंबे समय तक साथ रहने वाले पार्टनर संतानोत्पत्ति भी कर सकते हैं।
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दहेज़ के क़ानून की वजह से शादी करने में जोखिम बढ़ गया है। अत: युवक अब लिव-इन को तरजीह देने लगे है !! साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ कर दिया है कि यदि लिव इन में रहते हुए संतान हो जाती है तो यह मान्य होगी !! तो अभी कुछ सालो बाद आपको इन सब गेजेट नोटिफिकेशन के साइड इफेक्ट देखने को मिलेंगे।
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और तब तक आपका ध्यान इन कानूनो से हटाने के लिए पेड विशेषग्य अपने अखबारों में महिला सशक्तिकरण के बारे में लिखते रहेंगे और "जागरूक नागरिक" अन्य लोगो को जागरूक करने लिए उन्हें बताते रहेंगे कि देखो भारत की संस्कृति को क्या हो गया है, और हम कहाँ जा रहे, च्च च्च !! और इसी टाइप की ज्ञान और उपदेश की बातें !! उनके हिसाब से च्च च्च करना, लानत भेजना और उपदेश करना ही समाधान है !! मेरे हिसाब से से समाधान से ध्यान हटाने का नुस्खा है, ताकि समस्या पनपती रहे !!
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समाधान ?
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दहेज़ और घरेलू हिंसा के मामले की सुनवाई महिलाओं की जूरी द्वारा की जाए। दहेज़-घरेलू हिंसा की शिकायत आने पर जूरी का गठन होगा रोजाना सुनवाई के कारण हफ्ते दो हफ्ते में फैसला आ जाएगा। जूरी कोर्ट के आने से अगले 6 महीने में भारत की अदालतों में लंबित सभी दहेज़ के मुकदमो का निस्तारण हो जाएगा। ( जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट जूरी मंच में देखें। )
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अब यदि आपको Hypocrisy at its Best देखनी हो तो किस भी नारी वादी विशेषग्य से पूछ सकते है कि, क्या महिला सम्बन्धी अपराध की सुनवाई करने का अधिकार महिलाओं की जूरी को दिया जाना चाहिए ?
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वे आपको एक बहुत ही फैला हुआ किन्तु परन्तु से युक्त बौद्धिक जवाब देंगे, लकिन इसका निचोड़ यही होगा कि -- नहीं !! नहीं !! नहीं !! महिलाओं के खिलाफ मुकदमो की सुनवाई का अधिकार महिलाओं की जूरी को नहीं दिया जाना चाहिए !!
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और यही जवाब आपको दहेज़ वाले क़ानून पर भी मिलेगा। उनका हमेशा से यही स्टेंड रहता है, कि दहेज़ के मामलो की सुनवाई का अधिकार महिलाओं की जूरी को नहीं दिया जाना चाहिए।
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जहाँ तक महिला आयोग की बात है, मेरा स्टेंड है कि महिला आयोग का महिला सशक्तिकरण से कोई लेना देना ही नही है। असल में बहुधा नारीवादी संगठन संवेदनाएं बेचने के कारोबार में है और जिस नीति पर काम कर रहे है वह नीति महिलाओं को सशक्त होने से रोकने का काम करती है। इनकी नीति महिलाओं को उत्पादक और आत्मनिर्भर बनाने की जगह उन्हें अनुत्पादक बनाती है। किन कानूनों की सहायता से वे महिलाओं को नग्नता, ग्लेमर, अश्लीलता की और धकेलकर उन्हें बाजार की एक अनुत्पादक वस्तु में बदल रहे है, और कैसे यह पूरी कवायद मिशनरीज के लिए कन्वर्जन की जमीन तैयार करती है, इस पर मैं फिर किसी जवाब में लिखूंगा।
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